आज का संदर्भ
चन्दन है इस देश की माटी,
तपो भूमि हर ग्राम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा,
बच्चा-बच्चा राम है।
चन्दन है इस...................
हर शरीर मंदिर सा पावन
हर मानव उपकारी है।
आ S आ S
जहाँ सिंह बन गए खिलौने,
गाय जहाँ माँ प्यारी है।
चन्दन है इस...................
जहाँ सवेरा शंख बजाता
लोरी गाती शाम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा,
बच्चा-बच्चा राम है।
चन्दन है इस...................
जहाँ कर्म से भाग्य बदलते,
श्रम निष्ठा कल्याणी है,
त्याग और तप की गाथाएँ
गाती कवि की वाणी है।
ज्ञान जहाँ का गंगा जल सा
निर्मल है अविराम है
हर बाला देवी की प्रतिमा,
बच्चा-बच्चा राम है।
चन्दन है इस...................
इसके सैनिक समर भूमि में
गाया करते गीता हैं।
जहाँ खेत में हल के नीचे,
खेला करती सीता है।
जीवन का आदर्श यहाँ पर
परमेश्वर का धाम है।
चन्दन है इस...................
तपोभूमि हर ग्राम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा,
बच्चा-बच्चा राम है।
चन्दन है इस...................
सबसे अच्छी सामाजिक व्यवस्था जंगल है |
यह सचमुच अभयारण्य है |
कोई संविधान/कानून/न्यायालय की दुहाई,धमकी, 24 घंटे टेंशन, नहीं हैं | न इससे जनित, अव्यवस्था; जो मानव समाज का चौबीसों घंटें, सालों भर, लगातार दुख का कारण हैं |
यह सिर्फ मानवो को तंत्रों के अधीन परतंत्र एवं विवश कर देता है,जिंदगी सुगम, सुलभ, प्राकृतिक दैवीय नहीं रह पता है |
जंगलों में दूसरी बड़ी स्वतंत्रता रिश्तों के बन्धनों, से बड़े छोटे के एहसास से मुक्ति की है |
मानव समाज में तो रिश्ते हैं; रिश्तों के भी कानून है, कानून नहीं तो रिवाज है, और रिवाजों का असहनीय दबाव है |
वहाँ कुछ भी नहीं, अतः सारे आचरण, प्राकृतिक, स्वाभाविक और स्वतंत्रत है |
निश्चिन्तता और स्वतंत्रता है |
जीवन, आजाद है |
तलाश परिवार
डॉ० विश्वेन्द्र कुमार सिन्हा
एक ‘मान्यता’ है- न्याय का आधार है; दिशा निर्देश है –
“99 दोषी भले ही छुट जाए 1 भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिये”- इसका विश्लेषण होना चाहिये |
इस मान्यता के दो हिस्से है - एक निर्दोष को सजा नही होनी चाहिये
- कोई भी इसका विरोध नहीं कर सकता भले ही ज्यादातर under trail सजा भोग चुके होते हैं, और अनेकों उदाहरण है, जो दशकों जेल में रहने के बाद निर्दोष घोषित हुये हैं | तो यह सिद्धांत/मान्यता कहाँ पालित हुआ !
दूसरा भाग 100 में 99 दोषी को सजा न मिले फिर चोरी डकैती, बेईमानी मिलावट, जमाखोरी जैसे
अपराध क्यों रेप, हत्या, अपहरण, हजारों करोड़ का गबन, दंगा जैसे अपराध क्यों नहीं करे – सौ में नब्बे तो छूटेंगे ही या अपना जीवन जी ही लेंगे, मरने बाला मरा, तो इतना तो साहस करना किसी भी व्यापर/कार्य के लिये आवश्यक हैं| हितों का टकराव हो ही जाता है |
उदहारण-2
अनुसूचित जाति सम्बंधी कानून, 498A सम्बंधित कानून,
कई बार यह न्यायालय द्वारा भी स्वीकृत हुआ है कि इनका दुरुपयोग हो रहा है| न्यायालय द्वारा सुधार भी होते रहें हैं परन्तु कुछ नहीं बहुतेरे निर्दोष द्वारा सजा भुगतने के बाद!
निर्दोष को सजा न मिले का doctrine ?
ऐसी अनेकों मान्यतायें हमारी मजबूरियाँ हैं-
हमें इनके प्रति ज्यादा सोच विचार करना होगा !
तलाश परिवार
डॉ० विश्वेन्द्र कुमार सिन्हा
करीब एक साल पूर्व तलाश के बूंदे-4 पृष्ठ-24 लिखा गया था “ममता बनर्जी” स्वघोषित चुनाव परिणाम लेकर अपने गैंग के साथ कलकत्ता या फिर दिल्ली में बैठ जायेगी तो कोई क्या कर लेगा यह चरितार्थ हो रहा है |
बूंदे-4 का पृष्ठ-37 भी संदर्मित है |
ममता बनर्जी इस देश के ‘लोकतंत्र’ के लिये सही है क्योंकि कमजोर केंद्र देश को चरित्र देने में सक्षम नहीं है|
चुनाव नहीं हारी है-
मुख्यमंत्री है और रहेगी
सही भी है और क्योंकि इस नपुंसक देश/संविधान के रक्षकों का यही हाल है-
कुछ और भी लोग है कुछ और भी जगह है, जहाँ इसकी पुनरावृति होनी है/होगी |
देश के अन्दर बहुतेरे ऐसे है जो सिर्फ इसलिये sadistic है कि कोई प्रधानमंत्री मरता क्यों नहीं, कोई मारता क्यों नहीं है|
तलाश परिवार
डॉ० विश्वेन्द्र कुमार सिन्हा
हर धर्म का आधार मुख्यतः विश्वास है |
हर धर्म में (मेरा मानना है) अंधविश्वास भी है |
कौन ज्यादा/कम कहना सम्भव नहीं है, लड़ाई/रक्तपात का मुद्दा हो जायेगा |
विश्वास अंततः अंधविश्वास, एवं अंधभक्ति के रूप में सांस्कारिक इच्छाओं से जुड़ने या/एवं आध्यात्मिक उत्थान की संभावनाओं का लोभ भी गलत प्रथाओं/परम्पराओं का कारण है |
यह अंधविश्वास इस हद तक बढ़ जाता है कि यह अक्सर गैंग का रूप लेकर जर-जमीन के झगड़े के रूप में, सामूहिक अपराध के अन्य रूपों में, सामने आते रहते हैं |
सेक्स स्कैंडल चलते और छुपे रहते हैं |
धार्मिक असहिष्णुता, सामाजिक असहिष्णुता, समाज/देश/राष्ट्र को दोयम दर्जो में रख देता है |
बहुत मामलों में चरणामृत पान, जैसे अन्य (विवरण उचित नहीं हैं) आचरण के रूप में, अमानवीय रूप में परिणत हो जाता है |
इसी कारण भीड़ में भगदड़, जान माल की क्षति तो अक्सर ही होती रहती है |
इस सबका कारक संरक्षक परिवर्धक धर्मगुरु होते है |
ये धर्म से ज्यादा समूह संगठन का कार्य करते है |
तलाश परिवार
डॉ० विश्वेन्द्र कुमार सिन्हा
केजरीवाल अपने केस की सुनवाई के लिए पसंदीदा जज चाहते हैं।
सभी लोग ऐसा क्यों नहीं कर सकते!
क्या मजा है! मैंने अपराध किया है? अच्छा तो मेरे ये जज रहेंगे, जैसा ये कहेंगें।
और प्रभावशाली हो जायेगे तो किसी को भी अपने लिए जज बना लेंगे।
"समरथ के नहीं दोष गुसांई”- तुलसीदास का वचन कितना सत्य है- न्यायालय द्वारा सिद्ध एवं घोषित
प्रशांत भूषण को अवमानना में मान मनोबल कर एक रुपया का ‘दंड’(?); किसी को कारावास, किसी को और सजाएं।
इससे बड़ा किसी जज / न्यायालय का अपमान क्या हो सकता है कि मैं इनके कोर्ट में सुनवाई करवाऊंगा ।
यह तो स्वयं सिद्ध अवमानना है।
हमें पढ़ाया गया कि न्यायालय कमजोरों की सुरक्षा के लिये हैं। इसके सामने राजा, रंक बराबर, सभी नागरिक बराबर, ये पक्षपात और प्रभाव के निषेध के लिये आँखें बंद रखते हैं !
आँखें बंद रखते हैं इसलिए तो काफी कुछ दिखता नहीं।
संबंधित जज साहिबा को या तो त्याग पत्र देना चाहिये या केजरीवाल को सीधे सजा।
तलाश परिवार
(डॉ० विश्वेन्द्र कुमार सिन्हा )
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