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एच-3, डॉक्टर्स कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना-20
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भारतीय संविधान दुनिया के सबसे वृहत् संविधानों में से एक है। लेकिन समाज कैसे चलता है? इसके अपने रीति-रिवाज हैं। शादियों के नियम, सामाजिक व्यवहार के नियम, लिखे हुए हो सकते हैं परन्तु वे कानून नहीं हैं। सब कुछ कानून के दायरे में नहीं है। हर बात के लिए कानून बनाना संभव नहीं है फिर भी समाज चल रहा है और सुचारु रूप से चल रहा है। ऐसे बहुत से कबीले हैं, या सामाजिक इकाइयाँ हैं, जिनके अपने कानून हैं। ये देश के कानून से अलग भी हो सकते हैं परन्तु युगों से इन रिवाजों का पालन होता आ रहा है। ये अलिखित कानून लोगों को पीढ़ी दर पीढ़ी बहुत ही विस्तृत ढंग से Transmit होते आ रहे हैं। समयानुसार उसमें स्वतः परिवर्तन भी होते आ रहे हैं, लोगों को वह परिवर्तन स्वीकृत भी हो जाते हैं और अनुपालन भी होने लगता है।

कैसे?

परम्पराओं के प्रति व्यक्तिगत प्रतिबद्धता कैसे सुनिश्चित होती है?

समाज में आदर्श कैसे स्थापित हुए हैं?
नये आदर्श कैसे स्थापित होते हैं?
ये स्थापित आदर्श समाज को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का व्यवहार अनुकरणीय था, आदर्श था, कानून कभी नहीं बना। आज भी उदाहरणीय है क्यों?
इसमें अनुपालनार्थ कोई न्यायिक प्रक्रिया नहीं है, फिर भी इसका परिपालन कैसे सुनिश्चित है?
सामान्य लोकाचार के प्रति लोग कानूनी व्यवस्था से कहीं ज्यादा आश्वस्त होते हैं, क्यों?
कारण सिर्फ एक है:-
गलत को लोग गलत कहें, उसकी भर्त्सना करें।
"लोग भला क्या कहेंगे"? लोगों के कहने में अपार शक्ति है। 'लोगों का कहना' अत्यन्त मजबूत बंधन है, नियंत्रण है। हर कदम पर कामयाब है और हर जगह इसकी आवश्यकता है।

यह लोक-लाज, accpeted norms कानून से कहीं ज्यादा ताकतवर है जिसका लोग अनुसरण करते हैं।

यदि कार्यालय में कोई घूस ले रहा है और आप तीसरे व्यक्ति होकर टोक देते हैं, तो लड़ाई की नौबत आ जाती है।

गलत कर रहे अधिकारी को टोक दें, आपका काम खराब हो जाएगा।

चिकित्सक अस्पताल में देर से आते हैं, लोग नहीं टोकते हैं।
शिक्षक स्कूलों में नहीं आते हैं, यदि आप उनको सीधे कहेंगे तो पुनः झगड़े की नौबत आएगी।

यह भी प्रश्न होगा कि आप कौन होते हैं ऐसा कहने वाले, इत्यादि-इत्यादि।

गलत को गलत कहना साहस का कार्य है।
विरोध, लड़ाई और विभिन्न प्रकार की परेशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

तलाश के इस विषय के बारे में एक अत्यन्त वरीय, व्यक्ति का मानना था कि गलत को गलत कहना सही तो है परन्तु बहुत कठिन है। दवा तो है परन्तु बहुत कड़वी है।

हाँ, काफी हद तक यह सही है।
परन्तु अच्छे को अच्छा कहने में कोई आग नहीं उत्पन्न होती है। फिर भी यह बहुत प्रचलित नहीं है। क्यों कि यह भी साहस का कार्य है।

बेजारी/अनमनयस्कता/जड़ता से अलग-अच्छे को अच्छा कहना भी एक सक्रिय प्रक्रिया है। इसमें भी प्रयास लगता है।

फिर भी आसान है। अत्यन्त वांछनीय है।
उत्प्रेरक है।
दिशा निर्देशक है।
बीज मंत्र की तरह असरदार है।
जीवन में इस प्रकार के अणु प्रयास में कोई क्षति नहीं, कोई खर्च नहीं, फिर भी इसकी अत्यंत कमी है।

गलत को गलत एवं अच्छे को अच्छा कहना सड़क के दो किनारों की भाँति हैं। नदी के दो किनारों की तरह सामाजिक प्रवाह को सुनिश्चित एवं सुव्यवस्थित करती हैं। इन्हें हमें अपने दैनिक जीवन में, सामाजिक जीवन में, राष्ट्रीय जीवन में अपनाना ही चाहिए।

एक और व्यक्ति से मिलना है-
फिर कुछ और से
एक इकाई बनानी है-
पहचान करनी है-

समस्याओं की-
जरूरतों की-
जीवन स्तर के उत्थान में प्रगति के उपायों की।

सबसे आसान को कर डालना है,
निदान ढूँढ़ना है- कार्यान्वित करना है
अगली जरूरत / समस्या का-

सक्रिय रखना है अन्य लोगों को भी।

उदाहरणार्थ:-

आपके मुहल्ले में समस्याएँ हैं-
गली में अंधेरा रहता है,
गली में गंदगी फैली है, नाले बहते हैं,
स्कूल में शिक्षक नहीं आते हैं,
स्वास्थ्य उपकेन्द्र पर चिकित्सक नहीं आते हैं,
एक/कुछ व्यक्ति की रंगदारी है-
अन्यान्य।

यदि लोग गली में अंधेरा दूर करने में कुछ भी सहयोग करने को तैयार नहीं है, गंदगी फैलानेवालों को नहीं रोक सकते, तो,

कुछ लोग मिलकर मंदिर की सफाई तो कर सकते हैं?
जरूरतमन्द बच्चों को पढ़ा तो सकते है?
मिलकर सांस्कृतिक कार्य कीर्तन भजन तो कर सकते है?

फिर आप गली के अंधेरे को दूर कर सकेंगे-
फिर आप नहीं आनेवाले शिक्षक और चिकित्सक को आने के
लिए विनम्र निवेदन कर सकेंगे,
और फिर उच्चतर अधिकारियों से मिलकर उनकी उपस्थिति
सुनिश्चित कर सकेंगे।
स्कूल एवं अस्पताल के भवन, गलियों का पक्कीकरण के लिए
विभिन्न उपायों द्वारा (सांसद कोटा, विधायक कोटा, विभागीय कार्य इत्यादि) कर सकेंगे।

हर कोई सब कुछ नहीं कर सकेगा-
कुछ लोग कुछ करेंगे, दूसरे दूसरा करें-
पहले रंगदारी की धार कम होगी,
फिर रंगदारी की वह ऊर्जा भी अच्छे कार्य में लग जाएगी।

-सामाजिक उत्थान में तीव्रता आएगी,
यह अनवरत प्रक्रिया है।

कुछ भी अच्छा नहीं लगा? कुछ भी करने की हिम्मत नहीं है? किसी पर भी विश्वास नहीं है?

तो आज (हर रोज) एक रुपया और वाजिब तरीके से कमाने की कोशिश अवश्य प्रारंभ कर दें।

फिर अंधेरा स्वयं दूर होने लगेगा।

महानिबंधक बिहार के अनुसार सिर्फ बिहार में करीब 20 हजार स्वयंसेवी संस्थाएँ हैं, जिनमें करीब 2 हजार कार्यरत हैं, एवं उनमें काफी संस्थाएँ अच्छा कार्य कर रही हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण भारत में कितनी संस्थाएँ हुई?

ये तो संस्थाओं की बातें हैं। व्यक्तिगत स्तर पर हजारों नहीं शायद लाखों व्यक्ति ऐसे हैं जो स्वयं के अलावे 'पर' (दूसरों) के लिए कुछ-न-कुछ अच्छा कर रहे हैं।

ऐसी संस्थाएँ एवं लोग इतनी ज्यादा संख्या में युगों से कार्य कर रहे हैं। आज आप सब लोग यहाँ इकट्ठे हैं क्योंकि आप सब में कुछ बेहतर करने एवं होने की इच्छा है।

फिर भी अपेक्षित असर नहीं है। क्योंकि हम लोगों का स्वर अलग-अलग स्वर है।

अतः 'तलाश' की मूल अवधारणाओं में यह भी एक मूल बात है कि ऐसे सभी लोग, सभी संस्थाएँ मूलभूत तथ्य पर एक स्वर से आवाज दें तब यह आवाज इतनी बुलंद होगी कि बहरे बने लोग भी सुन लेंगे।

समूह अथवा संघ की ताकत सर्वोपरि है।
परिवर्तन के लिए समर्थ है।
परिवर्तन के लिए आवश्यक है। इसके बिना यथा-स्थिति बनी रहेगी।

तलाश में कुछ भी अधिकारिता नहीं है, कोई कापी राईट नहीं है, जहां से भी जो भी अच्छा लगता है हर कोई अपनी इच्छा के अनुसार अच्छा करने के लिए स्वतंत्र है, आमंत्रित है। कार्य होना चाहिए, बस।

हमारे देश की जनसंख्या आज करीब 120 करोड़ है। यदि हर व्यक्ति प्रतिदिन सिर्फ एक रुपया (वाजिब तरीके से) भी और कमाये तो प्रतिदिन इस देश में 120 करोड़ रुपये का कार्य होने लगेगा। यदि एक रुपया प्रतिदिन दस हाथों से गुजर जाए तो वह एक रुपया दस रुपया का काम कर डालेगा।

हमारे प्रदेश के ग्रामीण इलाके में शाम के बाद बिजली गुम हो जाती है। लोगों के पास निष्क्रिय हो जाने, सोने के अलावा कोई विकल्प शायद ही बचता है। अधिकतर युवक ताश खेलने लगते हैं- जो जुआ खेलने में परिवर्तित हो जाता है। अकेलेपन से जूझना शराब पीने में रूपान्तरित हो जाता है। दोस्तों के साथ कुछ करने, चोरियाँ करने अथवा अन्य प्रकार के छोटे-बड़े अपराध-कर्मों में परिवर्तित हो जाता है। इससे निर्माण के विपरीत निर्मित भी बिगड़ जाते हैं और यह हमारे मानव संसाधन का भयानक दुरुपयोग है। इसको यदि हम उपार्जन की ओर मोड़ सकें, खासकर ग्रामीण इलाकों में, तो देश निर्माण की प्रक्रिया तीव्र गति से हो सकेगी। कानून व्यवस्था या आतंकवाद की समस्या पर भी काबू पाया जा सकेगा।

क्या एक रुपया और लोगों की सृजनात्मक शक्ति को नहीं बढ़ाएगा?

राजनीति जीवन का आवश्यक पहलू है।
राजनीति हमारे जीवन को हर दिन लगभग हर जगह प्रभावित करती है।
हर व्यक्ति राजनीति को प्रभावित करता रहता है फिर अराजनैतिक होना कैसे संभव है ?

सक्रिय राजनीति यथार्थ की तरह है इसका एक स्वरूप है एक पहचान है- एक प्रक्रिया है। राजनीति सोद्देश्य है। प्रथमतः सत्ता हासिल करना। सत्ता परिवर्तन, जनकल्याण का काफी सीधा एवं सबसे असरदार रास्ता भी है, परन्तु ऐसा हमेशा होता नहीं है।

स्वामी विवेकानन्द का कार्य जन कल्याण का कार्य था, राष्ट्र निर्माण का कार्य था।

राम मोहन राय का कार्य सामाजिक उत्थान का कार्य था।
महात्मा गाँधी का कार्य सामाजिक उत्थान के लिए राजनीति का, शासन तंत्र के उपयोग का मार्ग था परन्तु स्वयं राजनीति से कोसों दूर थे।

राजनीति में विरोधाभास है, यह रेखाएँ खींचता है। समग्रता संभव नहीं है। प्रलोभन, मजबूरियाँ होती हैं। उद्देश्य भटक सकता है। अराजनीतिक प्रयास में उद्देश्य स्थिर होता है।
अहिंसा ?

पदाधिकारी महोदय आप कार्यालय इतनी देर से क्यों आए ?
आप पूछने वाले कौन हैं?
मैं... आम जनता हूँ, प्रजातंत्र का राजा।
ऐ किशन (Peon)! इन्हें बाहर करो ये सरकारी कार्य में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

क्रोध, Physical Clash
कानूनी कार्यवाई।
थाना, कचहरी, परेशानी।

शक्ति का ह्रास, दोनों पक्षों का। और फल? कार्य का नहीं होना, अन्य कार्यों में भी बाधा, आगे कभी भी ऐसे झगड़े पचड़े में न पड़ने की कसम एवं सीख।

हिंसा में संघर्ष सन्निहित है।
संघर्ष में उभय शक्तियों का क्षय भी निश्चित है।
छूटे हुए बाण की तरह अस्त्र है।
न लौट सकता है न इसका पुनः उपयोग हो सकता है।
विजय किसी एक ही पक्ष की सम्भव है।
अहिंसा में अपनी ऊर्जा का भंडार विशाल होना आवश्यक है। परन्तु उसमें क्षय नहीं होता, संघर्ष नहीं होता।

दोनों पक्षों की विजय होती है।
अत्यंत प्रजातांत्रिक है- उच्चतम मानवीय मूल्यों पर आधारित है। एक शस्त्र की तरह हमेशा साथ है।

हम सुधरेंगे-जग सुधरेगा

  • बच्चे गुड़ मत खा। पहले स्वयं गुड़ खाना छोड़ उस संत या गाँधी की तरह जो कम होते हैं, बिरले होते हैं और कभी-कभी ही होते हैं।
  • इन्होंने परिवर्तन भी किया है।
  • क्या सर्वसाधारण या बहुत लोग उस संत की तरह हो पाएँगे?
  • इस परिवर्तन में कितना समय लगेगा?
  • क्या परिवर्तन पुनः उस संत के पैदा होने की प्रतीक्षा करता रहेगा?
  • क्या एक गरीब दूसरे गरीब को गरीब कहने का हक खो देता है?
  • क्या एक चोर दूसरे को चोर नहीं कह सकता?
  • क्या सभी (अधिकांश) कहीं न कहीं चोर नहीं हैं?
  • चोर-चोर मौसेरे भाई बनकर और बड़ा खोट नहीं पैदा कर रहे हैं?
  • तो ?

  • ठीक है हम भी कहीं गलत हैं, परन्तु आप यहाँ गलत हैं, यह न करिये।
  • पहले अपने गिरेबान में झाँकिये।
  • दूसरे की तरफ एक ऊँगली दिखाने पर तीन ऊँगलियाँ अपनी तरफ इंगित करती हैं।
  • (जरूर! मुझको भी सुधरना चाहिए)
  • ठीक है, मैं भी गलती करता हूँ इसका मतलब यह नहीं कि आप गलती करें, इसका प्रभाव मुझ पर पड़े और मैं चुप रहूँ। मैं तो कहूँगा भी और कुछ करूँगा भी।
  • मैं भी आपको देख लूँगा, मैं भी आपके विरुद्ध लगता हूँ।
  • मैं आपको रोक तो नहीं सकता, अवश्य करिये।
  • ठीक है।
  • (मुझे भी अपनी कमियाँ दूर करनी पड़ेगी)
  • हम सब कम-से-कम एक सीढ़ी ऊपर तो चढ़ सकेंगे।

समस्याएँ कई हैं-
एक के बाद एक कतार में खड़ी हैं-
नयी नयी समस्याएँ उत्पन्न होती रहती हैं।

मैनपुरा सभा एवं तलाश द्वारा की गयी कई जनसभाओं एवं गोष्ठियों में यह उभरकर आया कि सबसे बड़ी समस्या, रंगदारी की है, छोटी-बड़ी स्थानीय, बृहत्तर...। लोगों ने यह समस्या रखी, हमारे पास हल नहीं (था)। रंगदारी व्यक्तिगत (छोटे समूह) द्वारा बहुत बड़े समूह का अलग-अलग दोहन है, प्रताड़ना है...

सभा में उपस्थित लोगों का विचार आया-
अभी उस समस्या को छोड़ें... गली की सफाई पर ध्यान दें यदि इसमें भी बाधा है तो स्कूल नहीं जा सकनेवाले बच्चों स्त्रियों को तो पढ़ाएँ।

"अपनी समस्याओं की पहचान, उनकी प्राथमिकता तय करना, अपनी समस्या एवं संसाधन की पहचान एवं उसके अनुरूप किसी एक छोटी बड़ी समस्या का निदान करें।" यह विचार आया।

रंगदारी पर बात करना मुश्किल था, सबों ने इस को दर किनार कर दिया। इसका हल असंभव मान लिया। एक व्यक्ति ने रोटरी क्लब की स्थापना के संबंध में बताया कि कैसे एक व्यक्ति के मन में विचार आया कि कुछ सामाजिक कार्य किया जाए। फिर समान विचार वाले चार दोस्त मिले, फिर प्लान बना। लोगों ने हँसी उड़ाई। फिर भी बारी-बारी से लोग मिले (इसलिए रोटरी) आज इतनी बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था बनी।

मिलना रंगदारी दूर नहीं कर सकता है। किसी समय जब जापान में अराजकता (रंगदारी) बहुत बढ़ गयी थी, चार (कुछ) युवकों ने मिलकर एक संस्था बनायी संस्था बढ़ी, संस्था का नारा बना-"पापी हमारे डर से थर-थर काँपें"। सामाजिक जीवन के पुनर्स्थापन में इसका सराहनीय स्थान रहा।

एक व्यक्ति ने अपने पिछड़े इलाके में एक महाविद्यालय बन जाने की कहानी बतायी कि कैसे कुछ दोस्तों ने गप्प में ये चिह्नित किया कि इलाके के पिछड़ेपन का कारण किसी महाविद्यालय का नहीं होना है, प्रतिभाशाली छात्र इसके बिना बर्बाद हो रहे हैं। इसे समाज का नहीं राज्य का कार्य कहते हुए कुछ ने असंभव के हद तक कठिन बताया। चर्चित होने से बात फैली, कुछ लोग आगे आए। सहमति मात्र से, सराहना मात्र से, कुछ लोगों ने चन्दा उगाहा, उनकी आलोचना हुई, उन पर तोहमत लगे... ज्यादा लोग शामिल हुए, प्रतिष्ठित लोग आगे आए महाविद्यालय बना आज उसमें बारह हजार विद्यार्थी पढ़ते हैं। इलाके से कई लोग इंजीनियर, डाक्टर, अधिकारी, नौकरीपेशा बने।

- मूल मंत्र "मिलें तो सही"

विकास श्रृंखला में मेंढ़क का महत्त्व एक ऐसी पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में है जो जल एवं थल दोनों में रह सकने में सक्षम हुआ। इसी के बाद सम्भवतः स्थल पर विकसित प्राणी समूहों का विकास हुआ।

मेंढक में एक अंग Cloaca (क्लोएका) होता है जिसके द्वारा-
मल उत्सर्जन,
मूत्र उत्सर्जन,
प्रजनन संबंधी क्रियाएं होती हैं।
हमारे शहर एवं गाँवों में सड़कें हैं-
- जिस पर लोग मल-मूत्र त्याग करते हैं।
- जो घर के एवं अन्य सभी प्रकार के कचरे फेंकने की जगह है।
- जो हमारे घर के नालों का निकास स्थल है।
- जो बरसाती पानी का एकमात्र निकास है।
- जिस पर हम दुकानें सजाते हैं, ठेलों पर सामन बेचते हैं।
- इस पर हम शादी-ब्याह, पूजा एवं अन्यान्य सामूहिक कार्य करते हैं।
- इस पर चलने का भी कार्य करते हैं।
- क्या हम और हमारा शहर अभी मेंढक की विकासावस्था में है?

स्वतंत्रता की लड़ाई-
दुश्मन सामने था, आकार था, पहचान थी,
सुभाष और गाँधी आए।

महाभारत की लड़ाई-
दुश्मन सामने थे, सगे भाई बांधव थे, गुरु, पितामह थे,
कृष्ण को आना पड़ा, अर्जुन को गाण्डीव उठाना पड़ा।

विकास की लड़ाई-
दुश्मन की पहचान भी मुश्किल है, आकारहीन है,
स्वार्थ, भ्रष्टाचार, निष्क्रियता, समाज से बेजारी, आलस्य।

मुश्किल है-
ये सभी दुश्मन हमारे अन्दर ही बैठे हैं,
खुद से लड़ना होगा, आपको आगे होना होगा।

गिरावट में अपनी भागीदारी कम करें-
थोड़ा और कम करें। तटस्थता दूर करें।
सक्रिय प्रयास करें।

ममता
:
पिताजी, हमारे घर के बगल में सड़क पर एक नल कई दिनों से बह रहा है।
पिता श्री
:
तो मैं क्या करूँ?
ममता
:
सड़क पर कितना कीचड़ हो गया है, लोगों को आने-जाने में कितनी असुविधा होती है, पीने योग्य पानी की बर्बादी अलग।
पिता श्री
:
जिनको नल ठीक करने की जिम्मेदारी है, वे नहीं देखते, जिन्हें असुविधा होती है वे नहीं बोलते, तो मैं इसमें क्या कर सकता हूँ?
ममता
:
असुविधा तो हमें भी हो रही है, आप इतने बड़े पदाधिकारी हैं, आप क्यों नहीं सम्बन्धित विभाग को कुछ कहते हैं?
पिता श्री
:
मैं ही सर दर्द क्यों लूँ?
ममता
:
यदि आप (जो समर्थ हैं) नहीं लेंगे (जिम्मेदारी) तो दूसरा (जो गुजर जाता है) कैसे कुछ कर सकेगा?
पिता श्री
:
अच्छा बाबा देखता हूँ।

नल का बेकार बहना बन्द हो गया।

ममता ने 'तलाश' की अग्रणी भूमिका निभाई, ममता के पिता श्री ने 'तलाश' का कार्य किया, 'तलाश' के कुछ करने से बहुत पूर्व से लोग कर रहे हैं। परन्तु बहुत थोड़े। ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस दिशा में सक्रिय होने की आवश्यकता है। ममता के सदृश्य 'पहरुओं' की हमें बहुत जरूरत है।

'तलाश' परिवार की ओर से ममता जहाँ भी हों (जहाँ-जहाँ भी हों) हमारी शुभ-कामनाएँ! एवं आकांक्षाएँ कि वे 'तलाश' की मशाल हमेशा जलाए रखेंगी।

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