आप लोग
क्या कहूँ कि किस तरह सड़ गए हैं आप लोग,
सियासत के पचड़े में पड़ गए हैं आप लोग।
दलदल में हैं धँसे हुए, छींटों से खेलते हैं,
फिर भी दामन साफ है, कहते हैं आप लोग।
हमारे दिलों में कितनी गहराई, जज़्बातों की है,
नश्तर चुभा-चुभा के नापते हैं आप लोग।
सीमाएँ बेमानी हैं, मूल्यों के अर्थ बदल डाले,
शर्म-ओ-हया को बेचकर जीते हैं आप लोग।
अपनों से ही लड़-कट के बिखरता है आदमी,
मुहब्बत के नाम से ही खेलते हैं आप लोग।
जिनकी आँखें हैं खोजती सुबह की रौशनी,
उनकी लंबी रातों के नुमाइंदे हैं आप लोग।
वो जो रोज भीख चौराहे पे माँगता है,
लूटने में तो उसे भी, न बख्शे हैं आप लोग।